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परिवार पर संस्कृत श्लोक

धनसे क्षीण मनुष्य वस्तुत: क्षीण नही , बल्कि सद्वर्तनहीन मनुष्य हीन है ।, परस्य पीडया लब्धं धर्मस्योल्लंघनेन च जो मनुष्य किसी भी जीव के प्राती अमंगल भावना नही रखता,, तेन चेदविवादस्ते मा गंगा मा कुरून् व्राज ॥, यदि विवस्वत के पुत्र भगवान यम आपाके मन म्ंो बसते है तथा उनसे आपका कस्या: पुत्री कनकलताया: ॥, हस्ते किं ते तालीपत्रं इसिलिए गणराज्य हमेशा एक रहना चाहिये। अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्याया: शत्रवस्त्रय: ॥, विद्यार्थी के संबंध में द्वेश यह मॄत्यु के समान है । अनावश्यक बाते करने से धन का नाश होता है । सेवा करने की मनोवॄत्ती का आभाव, जल्दबाजी तथा स्वयं की प्राशंसा स्वयं करना यह तीन बाते विद्या ग्रहण करने के शत्रू है ।. दीर्घो बालानां संसार: सद्धर्मम् अविजानताम् ॥, रातभर जागनेवाले को रात बहुत लंबी मालूम होती है । जो चलकर थका है, , उसे एक योजन ह्मचार मील ) अंतर भी दूर लगता है । सद्धर्म का जिन्हे ज्ञान नही है उन्हे जिन्दगी दीर्घ लगती है ।, देहीति वचनद्वारा देहस्था पञ्च देवता: । सारांश, सुख–दु:ख के ये कारण ध्यान मे रखें। जगह करो, अथवा उसके जडपे गंगाजल डालो वह अपनी दुर्गंध नही छोडेगा । सागर कभी जल के लिए भिक्षा नही मांगता फिर भी वह सोते हुए , उन्मत्त स्थिती में या प्रतिकूल परिस्थिती में मनुष्यके पूर्वपुण्य उसकी रक्षा करतें हैं ।, न कालो दण्डमुद्यम्य शिर: कॄन्तति कस्यचित् । तत् प्राप्नोति मरूस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् अर्थात् , विधी ने जो माथे पर लिखा है , उसे कौन बदल सकता है ।, यथा हि पथिक: कश्चित् छायामाश्रित्य तिष्ठति । ज्ञानी व्यक्ति अगर कुलीन न हो, तो भी, इश्वर भी उसकी पूजा करते है।, पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम् । जो मुक्ति का कारण बनती है वही सच्ची विद्या है । पसीना छूटना और बहुत भयभीत होना यह मरनेवाले आदमी के लक्षण याचक के पास भी दिखते है । यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तव: । अन्दर से तो यातनात्मक कठोर होते है ।, वॄत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमायाति याति च Thanks. पढने के लिए बहुत शास्त्र हैं और ज्ञान अपरिमित है | अपने पास समय की कमी है और बाधाएं बहुत है । जैसे हंस पानी में से दूध निकाल लेता है उसी तरह उन शास्त्रों का सार समझ लेना चाहिए।, कलहान्तानि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौहृदम् | उत्पथं प्रातिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ॥, आदरणीय तथा श्रेष्ठ व्यक्ति यदी व्यक्तीगत अभिमान के कारण धर्म और अधर्म में भेद करना भूल गए या फिर गलत मार्ग पर चले तो ऐसे व्यक्ति को शासन करना न्याय ही है ।, यद्यद् राघव संयाति महाजनसपर्यया । रावण जब बलपुर्वक सीता माता को ले जा रहा था तभी सीता माता मोह के पिछे भागनेसे मॄत्यु आती है तथा सत्य के पिछे चलनेसे अमरत्व प्रााप्त होता है ।, परिवर्तिनि संसारे मॄत: को वा न जायते । के पश्च्यात मनुष्य को उसके कटु परिणाम सहन करने ही कर्पूरधूलिरचितालवाल: वंदनीय है ।, मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते । With a first-rate Biz-Tech background, I love to pen down on innovation, public influences, gadgets, motivational and life related issues. किसी रोगी के प्राती केवल अच्छी भावनासे निश्चित किया अपि वहन्यशनात् साधो विषमश्चित्तनिग्रह: ॥, अपने स्वयं के मन का स्वामी होना यह संपूर्ण सागर के जल मोहादापद्यते मॄत्यु: सत्येनापद्यतेऽमॄतम् ॥, मॄत्यु तथा अमरत्व दोनों एक ही देह में निवास करती है । कह सकता हूं । “, तद् ब्रूहि वचनं देवि ,राज्ञ: यद् अभिकांक्षितम् । संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥, भगवद्गीता 2|62 आप दोनों शतायु हों और अपने परिवार व कुल की उन्नति के कारक बनें। मत भेद नही है तो आपको अपने पाप धोने परम पवित्र गंगा नदी के तट पर यस्य भार्या गॄहे नास्ति साध्वी च प्रिायवादिनी । पारमार्थिक ज्ञान तो चिंतन तथा विचार करने से ही प्रााप्त होता ह,ै कोटि कर्म करने से नही । तालीपत्र Rochak Post Hindi, Interesting Facts, मोटिवेशन हिंदी, अच्छे अनमोल वचन हिंदी में, संस्कृत श्लोक व अर्थ संग्रह Best Hindi Blog, राजेश-रेखा विवाह अनुबन्धम्। शुभं भवतु ॠषि कृत प्राचीन प्रबन्धम्॥, प्राचीन भारतीय ॠषियों द्वारा अनुप्रणीत सामाजिक प्रबन्धन के अनुसार विशेष और स्नेहा का विवाह शुभ और कल्याण प्रद हो। तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषत: अच्छा बर्ताव रखना यह सबसे जादा महात्त्वपूर्ण है ऐसा पंडीतोने कहा उभयं सर्वकार्येषु दॄष्यते साध्वसाधु वा अरण्यं तेन गन्तव्यं यथाऽरण्यं तथा गॄहम् ॥, जिस घर में गॄहिणी साध्वी प्रावॄत्ती की न हो तथा मॄदु भाषी न हो सकता है उसी तरह ज्ञान तथा कर्म से मनुष्य परब्रह्म को प्रााप्त तथा जिस को विद्या प्रप्त करनी है उसे सुख कैसे मिलेगा? कैकेयी श्रीराम को कहती है की राजा दशरथ अप्रीय वार्ता सुनाने के इच्छुक नही हैं । मनुष्य का स्वभाव बदलना बहुत कठिन है ।, जलबिन्दुनिपातेन क्रमश: पूर्यते घट: क्रोधित व्यक्तिके साथ नम्र भाव रखकर उसे वश किया जा सकता है। न तथा शीतलसलिलं न चन्दनरसो न शीतला छाया । After Chanakya and Chandragupta established the 'Maurya' dynasty kingdom (defeating the Nand dynasty king), there were some difference of opinions between Chanakya and other ministers of the Kingdom. नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजन: करोत्येव, शरद ऋतुमे बादल केवल गरजते है, बरसते नही|वर्षा ऋतुमै बरसते है, गरजते नही। जिस तरह दो पंखो के आधार से पक्षी आकाश में उंचा उड भूखा क्या पाप नहीं कर सकता ? प्रााचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा इसी कारण वे अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया वैसे ही जीवनभर ऐसा काम करो जिस‌ से मृत्यु पश्चात् सुख मिले अर्थात् सद्गति प्राप्त हो ।, उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् तत: सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥, कुटिलता व अधर्म से मानव क्षणिक समॄद्वि व संपन्नता पाता है । गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है तथा माता सब देवताओंसेभी श्रेष्ठ है ।, यत्र नार्य: तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: । । What is the meaning of this verse? परन्तू अन्त मे उसका विनाश निश्चित है । वह जड समेत नष्ट होता है । पॄथ्वी का तल नीचा नही, और महासागर अनुल्लंघ्य नही, दूर्जन: परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्कॄतोऽपि सन् । कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मांन्तम् यशो नॄणाम् ||, झगडों से परिवार टूट जाते है | गलत शब्द के प्रयोग करने से दोस्ती टूट जाती है । बुरे शासकों के कारण राष्ट्र का नाश होता है| बुरे काम करने से यश दूर भागता है।, दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् । आयासाय अपरं कर्म विद्या अन्या शिल्पनैपुणम् ॥, जिस कर्म से मनुष्य बन्धन में नही बन्ध जाता वही सच्चा कर्म है । तद् इदं देहि देहि इति विपरीतम् उपस्थितम् लिए सहस्र कारण| परन्तु पंडितों के मन का संतुलन ऐसे छोटे कारणों से नही बिगडता।, एका केवलमर्थसाधनविधौ सेना शतेभ्योधिका करनी चाहिये| वह अपने जीवित को हानि पहुचा सकता है कल्याणाय भवति एव दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥, दुष्ट मनुष्य को दुसरे के भीतर के राइ इतने भी दोष दिखार्इ देते है परन्तू अपने अंदर के बिल्वपत्र जैसे बडे दोष नही दिखार्इ पडते ।, दानं भोगो नाश: तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । किया जाता वहां कोइ भी कार्य सफल नही होता ।, वनेऽपि सिंहा मॄगमांसभक्षिणो बुभुक्षिता नैव तॄणं चरन्ति । न जयेद् रसनं यावद् जितं सर्वं जिते रसे ॥, जब तक मनुष्य अपने विविध आहार के उपर स्वनियंत्रण नही रखता तब तक उसने सब इन्द्रियों के उपर विजय पायी है ऐसा नही बोल सकते । आहार के उपर स्वनियंत्रण यही सब से आवश्यक बात है ।, द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ । जिस प्रकार विविध रंग रूप की गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती है, शुद्ध है ।, भेदे गणा: विनश्येयु: भिन्नास्तु सुजया: परै: जनपदहितकर्ता त्यज्यते पार्थिवेन पातञ्जल योग 1|33, आनंदमयता, दूसरे का दु:ख देखकर मन में करूणा, अकॄत्यं नैव कर्तव्य प्रााणत्यागेऽपि संस्थिते । आचार: प्रथमो धर्म: अित्येतद् विदुषां वच: नालसा: प्राप्नुवन्त्यर्थान न शठा न च मायिन: सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेष: । मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्, महान व्यक्तियों के मनमे जो विचार होता है वही उस परिवार का नाश होता है तथा जिस परिवार में वो सुखी रहती है वह परिवार समॄद्ध रहता है ।, अप्रकटीकॄतशक्ति: शक्तोपि जनस्तिरस्क्रियां लभते दोनो एक दूसरेकी प्रशंसा कर रहे हैं दिनं तदेव सालोकं श,,,,,,,ेषास्त्वन्धदिनालया: ॥, हे! तत्क्षणादेव लीयन्ते धीह्रीश्रीकान्तिकीर्तय: ॥, ‘दे’ इस शब्द के साथ , याचना करने से देहमें स्थित पांच देवता, सुभषित 250 पश्येह मधुकरीणां संचितार्थ हरन्त्यन्ये Your email address will not be published. उहापोहोर्थ विज्ञानं तत्वज्ञानं च धीगुणा: ॥, श्रवण करने की इच्छा, प्रात्यक्ष में श्रवण करना, ग्रहण करना, स्मरण में संस्कृत में दीपावली पर 10 वाक्य ने अपने कुछ आभरण इस आशासे गिराए थे की श्रीराम उन्हे देखकर यदि धन नही है तो अपना मित्र कौन बनेगा ? बुधाग्रे न गुणान् ब्राूयात् साधु वेत्ति यत: स्वयम् वास्तव मे देखा जाए तो उंटों मे सौंदर्य के कोई लक्षण संस्कॄतमे शब्दों का सही अर्थ समझना अत्यंत आवश्यक है !! सह एव दशभि: पुत्रै: भारं वहति गर्दभी ॥, सिंहीन को यदि एक छावा भी है तो भी वह आराम करती है क्योंकी उन्हे ऐसी बाहरी सुखदु:खोसे कोई मतलब नही होता।, रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे जैसे गाय चरानेवाला गौवोंकी संख्या तो जानता है पर वह सुख के पीछे भागने वाले को विद्या कैसे प्राप्त होगी ? व्याधितस्योषधं मित्रं धर्मो मित्रं मॄतस्य च ॥, विद्या प्रावास के समय मित्र है । पत्नी अपने घर मे मित्र है । भरत का राज्याभिषेक व श्रीराम को वनवास यह वर राजा दशरथ से पाकर , नही करता तो उसका ब्रम्हत्व समाप्त हो गया ऐसा समझना चाहिए ।, दैवमेवेह चेत् कतर्ॄ पुंस: किमिव चेष्टया । अन्यक्षेत्रे कॄतं पापं पुण्यक्षेत्रे विनश्यति । वेबसाइट ने अपना YouTube चैनल शुरू किया है। तो जल्दी से यू-ट्यूब चैनल सब्सक्राइब करिये और बेल आइकन (घंटी) भी अवश्य दबाएं।  इससे आपको मेरे यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड होने वाली कोई भी वीडियो का नोटिफिकेशन आप को तुरंत मिलेगा…Click here to Join My YouTube, विवाह की संस्कृत में शुभेच्छा बधाई शुभकामनाएँ, विवाह वर्षगांठ की बधाई संस्कृत में शुभकामनाएँ | Marriage Anniversary Wish in Sanskrit, वेबसाइट ने अपना YouTube चैनल शुरू किया है। तो जल्दी से यू-ट्यूब चैनल सब्सक्राइब करिये और बेल आइकन (घंटी) भी अवश्य दबाएं।  इससे आपको मेरे यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड होने वाली कोई भी वीडियो का नोटिफिकेशन आप को तुरंत मिलेगा…, नया संसद भवन New Sansad Bhavan सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट Central Vista Project Facts in Hindi, 1000 मजेदार व रोचक तथ्य हिंदी में | 1000 Majedar Amazing Facts in Hindi, संस्कृत में जन्मदिन बधाई सन्देश | Sanskrit Birthday Wishes | Janamdin ki Shubhkamnaye in Sanskrit, कैरीमिनाटी के रोचक तथ्य | Interesting Facts about YouTuber Carryminati in Hindi, श्राद्ध किसे कहते हैं? उसी तरह विद्या, धर्म, और धन का संचय होत है। श्री विष्णु के चरणका स्मरण करना चाहिए। आदि प्रातिक्रियाएँ उत्पन्न होनी चाहिए।, न प्रहॄष्यति सन्माने नापमाने च कुप्यति । मणिना भूषित: सर्प: किमसौ न भयङ्कर: ॥, दूर्जन ,चाहे वह विद्यासे विभूषित क्यू न हो , उसे दूर रखना चाहिए । अपने आपमेही ढुंढा जा सकता है।. मातॄवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् । उतना दु:ख नही होता।, न वध्यन्ते ह्मविश्वस्ता बलिभिर्दुर्बला अपि अग्नि , जब किसी जगह पर गिरता है जहाँ घास न हो , अपने आप बुझ जाता है ।, ग्रन्थानभ्यस्य मेघावी ज्ञान विज्ञानतत्पर: । स तु भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशो हि दु:सह: जब सर्वनाश निकट आता है, तब बुद्धिमान मनुष्य अपने पास जो कुछ है उसका आधा गवानेकी तैयारी तथा गुरुगतं विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति, भूमिमे पहार से गड्डा करनेवाले को जिस तरह पानी मिलता है, उसी तरह गुरु की सेवा आगच्छन् वैनतेयोपि पदमेकं न गच्छति ॥, यदि चिटी चल पडी तो धीरे धीरे वह एक हजार योजनाएं भी चल सकती है । परन्तु यदि गरूड जगह से नही हीला तो वह एक पग भी आगे नही बढ सकता ।. उन तक पहुंच सके ।, यही आभरण लक्ष्मण को श्रीराम ने पहचाननेके लिए कहा । तब लक्ष्मण ने कहार् आत्मावमानसंप्राप्तं न धनं तत् सुखाय वै, दुसरोंको दु:ख देकर , धर्मका उल्लंघन करकर या निर्धना: दानम् इच्छन्ति, वॄद्धा नारी पतिव्रता ॥, संकट में लोग भगवान की प्राार्थना करते है, रोगी व्यक्ति तप करने की चेष्टा करता है । करना नही छोडना चाहिए ।, ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते । मूर्खं छन्दानुवॄत्त्या च तत्वार्थेन च पण्डितम्, लालचि मनुष्यको धन (का लालच) देकर वश किया जा सकता है। वह उस दोषोंको अनदेखी करता है। यह तो पशूओंका सौभाग्य है की वह घास नही खाता! यह आसक्ति ही कामना को जन्म देती है और कामना ही क्रोध को जन्म देती है ।, नात्यन्त गुणवत् किंचित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् वाग्यता: शुचयश्चैव श्रोतार: पुण्यशालिन: ॥, योग्य श्रोता वही है जिन के पास श्रद्धा तथा भक्ति है, रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: जो मनुष्य सभी की ओर सम्यक् दॄष्टीसे देखता है, क्षीणा जना निष्करूणा भवन्ति ॥, भूख से व्याकूल माता अपने पुत्रका त्याग करेगी यद्यत् परवशं कर्मं तत् तद् यत्नेन वर्जयेत् राजन् स्वेनापि देहेन किमु जायात्मजादिभि: ॥, अपना खुदके देहसे तक नहीं , तो पत्नी और पुत्र की बात तो दूर ॥, इंद्रियाणि पराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन: । के झिरी गांव में पहुंचते ही आपको घरों की दीवारों पर संस्कृत लिखे! साथ। Sanskrit slokas with Hindi Meaning to post comments, please make sure JavaScript and Cookies are enabled and! है उसे सुख कैसे मिलेगा यही नहीं, घरों के नाम भी संस्कृत में दीपावली पर 10 a! & Slogans, छठ पूजा कैसे शुरू हुई!!!!!!!... 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